सुप्रीम कोर्ट ने अरावली पहाड़ियों (Aravalli Hills and Ranges) को लेकर एक नई कानूनी परिभाषा स्वीकार कर ली है। इसके तहत अब सिर्फ वही क्षेत्र अरावली माना जाएगा, जिसकी स्थानीय जमीन के मुकाबले ऊंचाई कम से कम 100 मीटर या उससे ज़्यादा है
100 मीटर से कम ऊँचाई वाले लगभग 90% हिस्से अब कानूनी तौर पर अरावली के दायरे में नहीं आएँगे।
इसका परिणाम यह हुआ कि अब उन इलाकों में खनन (Mining) और विकास गतिविधियाँ पर अलग नियम लागू हो सकते हैं।
क्यों फैसले की ज़रूरत पड़ी?
सुप्रीम कोर्ट ने यह मामला लगभग एक दशक पुराने M.C. Mehta व T.N. Godavarman जैसे पर्यावरण मामलों के अंतर्गत उठाया था, जहाँ यह सवाल उठा कि खनन गतिविधि अरावली की निगरानी के दायरे में आती है या नहीं. अलग-अलग राज्यों में अरावली की परिभाषा अलग थी, जिससे नियमों में असमानता बन गई थी।
क्या नया नियम लागू किया गया?
✔️ नई परिभाषा स्वीकृत – 100 मीटर का मानदंड
✔️ सस्टेनेबल मैनेजमेंट प्लान (Sustainable Mining Plan) बनाना कोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देशित किया है
✔️ नई खानों के लाइसेंस नहीं दिए जाएंगे जब तक यह प्लान तैयार नहीं होता
✔️ पहले से मौजूद खनन कानूनी रूप से जारी रहेंगे लेकिन नियमों के अनुरूप होंगे_REQUIRED_SUSTAINABLE_PLAN
फैसले का मुख्य असर
🔹 पर्यावरण और खनन नियमों पर बड़ा प्रभाव:
- 100 मीटर से नीचे के कई हिस्सों को अब संरक्षण से बाहर माना गया है
- इससे वहाँ खनन गतिविधियाँ और निर्माण आसान हो सकता है
- कोर्ट ने निर्देश दिया है कि नए खानों की अनुमति तब तक नहीं दी जाएगी जब तक सस्टेनेबल मैनेजमेंट प्लान तैयार नहीं हो जाता
राज्य सरकार और केंद्र को रणनीति बनानी होगी:
मोEFCC और संबंधित विभागों को वैज्ञानिक मानचित्रण और प्रबंधन योजनाएँ तैयार करनी हैं ताकि खानन संरक्षित तरीके से हो और अरावली के इकोलॉजी को नुकसान न पहुँचे
. विशेषज्ञों और जनता की प्रतिक्रिया
☠️ पर्यावरण विशेषज्ञ चिंतित:
विशेषज्ञ और एक्टिविस्ट कहते हैं कि इस फैसले से अरावली की संरचना कमजोर होगी, भूमिगत जल स्तर और जैव विविधता पर बुरा असर पड़ेगा और रेगिस्तान फैलने की प्रक्रिया तेज होगी.
राजनीतिक प्रतिक्रिया:
पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने कहा कि यह फैसला खनन माफ़िया के लिए “रेड कार्पेट” बिछाने जैसा है और भविष्य में इसके गंभीर परिणाम होंगे.
सामाजिक बहस:
सोशल मीडिया पर अरावली संरक्षण को लेकर नई बहस चल रही है — जहाँ लोग कानून और पर्यावरण दोनों पक्षों पर चर्चा कर रहे हैं.
पर्यावरणीय महत्व
अरावली पहाड़:
- उत्तर भारत में रेगिस्तान के फैलाव को रोकती है
- भूजल रिचार्ज और वर्षा चक्र को संतुलित करती है
- जैव विविधता और वायु गुणवत्ता के लिए अहम है
इस फैसले के कारण जो भाग संरक्षण से हटेंगे, वहाँ पर्यावरणीय प्रभाव गंभीर हो सकते हैं.